प्रत्यभिज्ञाहृदयम्
Pratyabhijñāhṛdayam
- 1 citiḥ svatantrā viśvasiddhihetuḥ स्वतन्त्र चिति (परम चैतन्य) ही विश्व की अभिव्यक्ति का कारण है।
- 2 svecchayā svabhittau viśvam unmīlayati वह अपनी स्वेच्छा से अपने ही भित्ति-पट पर विश्व को उन्मीलित (प्रकट) करती है।
- 3 tan nānā anurūpa-grāhya-grāhaka-bhedāt वह (विश्व) ग्राह्य (विषय) और ग्राहक (विषयी) के परस्पर अनुरूप भेद के कारण अनेक रूप वाला है।
- 4 citi-saṃkocātmā cetano 'pi saṅkucita-viśvamayaḥ चिति के संकोच को अपना स्वरूप बनाने वाला चेतन (जीव) भी संकुचित विश्व से युक्त — अर्थात्…
- 5 citir eva cetana-padād avarūḍhā cetya-saṅkocinī cittam चिति ही चेतन-पद से अवरूढ़ (नीचे उतरी) होकर तथा ज्ञेय (चेत्य) से संकुचित होकर 'चित्त'…
- 6 tan-mayo māyā-pramātā उसी (चित्त) से बना हुआ माया-प्रमाता (मायाबद्ध जीव-प्रमाता) है।
- 7 sa caiko dvi-rūpas tri-mayaś catur-ātmā sapta-pañcaka-svabhāvaḥ वह (प्रमाता) एक होते हुए भी द्विरूप (शिव-शक्ति), त्रिमय (तीन मलों या तीन उपायों वाला),…
- 8 tad-bhūmikāḥ sarva-darśana-sthitayaḥ सभी दर्शनों की स्थापित स्थितियाँ उसी (एक चिति) की भूमिकाएँ हैं।
- 9 cid-vat tac-chakti-saṅkocān malāvṛtaḥ saṃsārī चित्-स्वरूप होते हुए भी अपनी शक्तियों के संकोच के कारण मलों से आवृत होकर वह संसारी (संसार…
- 10 tathāpi tad-vat pañca-kṛtyāni karoti तथापि वह (बद्ध जीव) उस (शिव) के समान ही पाँच कृत्यों को करता है।
- 11 ābhāsana-rakti-vimarśana-bījāvasthāpana-vilāpanatas tāni वे (पाँच कृत्य) आभासन (प्रकटीकरण = सृष्टि), रक्ति (आस्वादन = स्थिति), विमर्शन (विमर्श =…
- 12 tad-aparijñāne sva-śaktibhir vyāmohitatā saṃsāritvam उस (स्वस्वरूप) का परिज्ञान न होने पर अपनी ही शक्तियों से मोहित हो जाना ही संसारित्व (बद्ध…
- 13 tat-parijñāne cittam eva antarmukhī-bhāvena cetana-padādhyārohāc citiḥ उस (स्वस्वरूप) का पूर्ण परिज्ञान होने पर चित्त ही अन्तर्मुख होकर चेतन-पद पर आरूढ़ होकर…
- 14 citi-vahnir avaroha-pade channo 'pi mātrayā meyendhanaṃ pluṣyati चिति-रूप अग्नि अवरोह-दशा (बद्ध अवस्था) में आच्छन्न (ढकी) होते हुए भी आंशिक रूप से…
- 15 bala-lābhe viśvam ātmasāt karoti (चिति के पूर्ण) बल की प्राप्ति होने पर वह सम्पूर्ण विश्व को आत्म-रूप कर लेती है।
- 16 cid-ānanda-lābhe dehādiṣu cetyamāneṣv api cid-aikātmya-pratipatti-dārḍhyaṃ jīvan-muktiḥ चिदानन्द की प्राप्ति होने पर देह आदि के विषय-रूप में अनुभूत होते रहने पर भी चिति के साथ…
- 17 madhya-vikāsāc cid-ānanda-lābhaḥ मध्य (मध्य नाड़ी / केन्द्र) के विकास से चिदानन्द की प्राप्ति होती है।
- 18 vikalpa-kṣaya-śakti-saṅkoca-vikāsa-vāha-cchedādy-antakoṭi-nibhālanādaya ihopāyāḥ यहाँ (इस मार्ग में) विकल्प-क्षय, शक्ति का संकोच-विकास, (प्राण-अपान के) वाह का छेद,…
- 19 samādhi-saṃskāravati vyutthāne bhūyo bhūyaś cid-aikyāmarśān nityodita-samādhi-lābhaḥ समाधि के संस्कार से युक्त व्युत्थान-दशा में चित् के साथ ऐक्य के बार-बार आमर्शन (विमर्श)…
- 20 tadā prakāśānanda-sāra-mahā-mantra-vīryātmaka-pūrṇāhantā-veśāt sadā sarva-sarga-saṃhāra-kāri-nija-saṃvid-devatā-cakreśvaratā-prāptir bhavatīti śivam तब प्रकाश और आनन्द जिसका सार है तथा महामन्त्र (अहम्) का वीर्य जिसका स्वरूप है — ऐसी पूर्ण…